अपनी ये दुविधा कैसे मैं बोलूं
आँख मिचोली किसके संग खेलू
आँचल में अपने किसको मैं ले लूँ
संग संग जिसके हवा जैसे डोलूं
ममता की लोरी पलने की डोरी
गाऊँ मैं कैसे कोई सुनता ना मोरी
छोटी सी पूरी माखन कटोरी
खिलाऊँ किसे मैं मलाई गिलोरी
नन्ही सी आँखें तुतली सी बातें
सुलाऊँ किसे मैं जग जग कर रातें
कोमल से कर जो ताली बजाते
पल वो ढूँढू जो हमको सताते
किसको डांटू पागल कहकर
आंसू पोंछुं रो कर रुला कर
नैन कहाँ जिन्हें सपने देकर
अपना मानू जिनको पाकर
गोद है सूनी आँगन सूना
सूना पड़ा घर का हर कोना
ना कुछ पाना ना कुछ खोना
ना कोई मांगे कोई खिलौना
कोई नहीं जो आवाज़ लगाये
पल्लू खींचे मुझको बुलाये
जिद पे अपनी जो अड़ जाये
माने न मोरी और मुझको सताए
मेरा अपना जिसपे वारी जाऊं
बच्चा जिसकी माँ कहलाऊँ
दर्द है मेरा कैसे बताऊँ
कैसे बोलूं किसको सुनाऊँ
congratulations on your maiden blog and what a start!!! Ye Kuchh panktiyan have a very deep meaning indeed...keep it up!!
ReplyDelete- Shalabh
Its not easy to write about a third person.You caught the intricacies of a Surrogate mother.Her moodswing in the course of the poem is the best thing about your poem.Her want for a child and her despair due the lack of the same is touching.The writing style brings the freshness to the old feminine style of hindi poem writing,Mahadevi Verma use to write like this.NICE WORK!!!!
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